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प्रश्न

ध्यान

ध्यान साधना के प्रश्नों पर

परम पूज्य स्वामी तेजोमयानन्द जी के उत्तर

1) प्रश्न - ध्यान क्या है?

उत्तर - ध्यान कुछ करना या कुछ होना नहीं है। वरन अपने यथार्थ "सत्" स्वरूप में स्थित रहना है। यह निज स्वरूप अनादि, अनंत, असीम सत्ता ही है। जो निरंतर, प्रयास हीन, बोधस्वरूप अपने अस्तित्व में स्थित है वह सदैव सहज ध्यान की अवस्था में ही रहता है। ऐसे ही पुरुष को सिद्ध पुरुष कहते हैं।

2) प्रश्न - ध्यान साधना क्या है? यह किसके लिए है? इसका अभ्यास करने वाले में क्या योग्यता होनी चाहिए?

उत्तर - ध्यान साधना उन साधकों के लिए है जिनका परमार्थ अभी सिद्ध नहीं हुआ है। वे अभी अपने स्वरूप में स्थित तो नहीं हुये हैं तथापि पूर्णत: अज्ञानी भी नहीं है। जिन जिज्ञासुओं को यह ज्ञात हो गया है कि किसका ध्यान करना है तथा जिन्हें ध्यान प्रक्रिया की भी ठीक-ठीक जानकारी है वे ही सफलतापूर्वक ध्यानाभ्यास कर सकते हैं।

3) प्रश्न - ध्यान का प्रयोजन क्या है?

उत्तर - ध्यान का प्रयोजन कुछ नया प्राप्त नहीं करना है वरन अपनी भ्रान्ति "मैं शरीर, मन या बुद्धि हूँ" को मिटाकर सत्य का यथावत दर्शन करना और उसी में दृढता से स्थित रहना है।

4) प्रश्न - ध्यानाभ्यास का स्वरूप क्या है?

उत्तर - अनात्मा को नकारना तथा प्रत्येक आत्मा में ही आत्म भाव दृढ करना है। नाम रूपात्मक विषय जगत से ध्यान हटाकर जगत के दृष्टा विषयी में ध्यान केन्द्रित करने को ध्यानाभ्यास कहते हैं। सिद्ध पुरुष जिसने सत्य का साक्षात्कार कर लिया है और उसी में एकीकृत होकर स्थित है उसके लिए ध्यान का अभ्यास निरर्थक है।

इस प्रकार ध्यान न कुछ करना है और न कुछ होना है वरन ‘‘जो आप हैं’’ वही रहना है।

5) प्रश्न - ध्यानकर्ता कौन है और किसका ध्यान किया जाता है?

उत्तर - ध्यान करने वाला तथा ध्यान का विषय दोनों ही स्वयं मैं ही हूँ। मैं अपने आप पर ही ध्यान केन्द्रित कर रहा हूँ।

6) प्रश्न - ध्यान की प्रक्रिया क्या है?

उत्तरः- स्थूल शरीर को नियंत्रित करके सूक्ष्म मन को नियंत्रण में लाने के प्रयास से ध्यान प्रारम्भ होता है। शरीर को स्थित रखने से मन भी स्थिर हो जाता है। ध्यानकर्ता ध्यान के समय न गृहस्थ है न व्यापारी। वह एक त्यागी, सन्यासी है इसी भाव से ध्यान साधना के लिए बैठना चाहिए। इन्द्रिय संयम तथा मन में उठने वाली वृत्तियों की उपेक्षा कर देने से मन शान्त हो जाता है। अब शान्त मन में इस तरह की धारणा करें, ‘‘मैं देह, मन तथा बुद्धि नही हूँ वरन इन सबको प्रकाशित करने वाली चेतना हूँ। मैं मात्र शुद्ध चेतना हूँ ’’ कुछ समय के बाद यह वृत्ति शान्त हो जायेगी तथा सत्ता ही शेष रहेगी - मात्र शुद्ध चैतन्या अब समाहित मन समाधि में है। इस समाहित स्थिति से मन के पुन: उठने पर भी स्मरण रहे कि सत्तामक चैतन्य तो निरन्तर अब भी विद्यमान है और यही चैतन्य तुम हो। इस चेतना में स्थित रहते हुए जगत को देखो, अब यह जगत दिव्य ही दिखेगा। आप जगत को नहीं बदल सकते अपनी दृष्टि को बदल सकते हैं। ‘‘जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि होती है’’

7) प्रश्न - जो ध्यान का जीवन जीना चाहता है वह इस संसार में कैसा आचरण करें?

उत्तर - इस संसार में हमें वस्तुओं, व्यक्तियों (सबसे कठिन) और स्थितियों इन तीन के साथ ही रहना पडता है। हम वस्तुओं के साथ कैसे रहें? हमारा भाव यही रहे, ‘‘वस्तुयें हमारे लिए हैं, हम वस्तुओं के लिए नहीं है। मुझे उनका दास कदापि नहीं बनना हैं। उन्हें आवश्यकता से अधिक मान्यता नहीं देनी है। जूते का मूल्य टोपी से अधिक होने पर भी जूते का स्थान पैर में तथा टोपी का स्थान सिर पर है। इसके विपरित आचरण नहीं होता। विषय बाहर है उन्हें बाहर ही रहने दो मन में मत लाओ।

     व्यक्तियों के साथ व्यवहार!

     जिस प्रकार सूर्यास्त की बेला में आकाश मंडल में छाये विविध रंगों के सौन्दर्य का आनन्द लेते हैं। न उनकी शिकायत करते हैं न आपस में उनकी तुलना करते हैं। इसी प्रकार सभी व्यक्तियों की बिना एक दूसरे से तुलना किये तथा सबकी किसी प्रकार की आलोचना किये बिना वे जैसे हैं उन्हें वैसा ही स्वीकार करके प्रसन्न रहना सीखें। उनकी विषमता में आप तो सम रहें।

     अनुभवों के साथ कैसे रहें!

     सुख, दुख, अनुकूल प्रतिकूल, सफलता असफलता यह द्वन्द एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जीवन में यह क्रम आते ही रहेंगे परिवर्तन ही इस जगत का अपरिवर्तनशील नियम है। अतः प्रत्येक परिस्थिति में हमें मन का संतुलन बनाये रखने की कला सीखनी चाहिए। एक सिद्ध पुरुष इनमें उलझे बिना तटस्थ भाव से कर्म करता रहता है तथा निरन्तर अपने आनन्द में ही रमण करते हुये इनका आना जाना भी देखता रहता है।  

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