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प्रश्न

मनुष्य की संरचना

1) प्रश्न -   मनुष्य क्या चाहता है ?

उत्तर-    मनुष्य सुख चाहता है इसीलिए उसमें हर समय इच्छा बनी रहती है। किसी किसी रुप में कामना उत्पन्न होकर मनुष्य के सारे कार्यों , भावनाओं और विचारों को प्रेरित किया करती है। बिना कामना के मनुष्य कुछ भी कर्म नहीं करता। और वह कामना किसी भी रुप में हो, कुछ पाने और उसका भोग कर सुखी होने की होती है।    

2) प्रश्न  -  मनुष्य के अनुभव और ज्ञान के साधन क्या है ?

उत्तर  -  जगत् में बहुत प्रकार की वस्तुएं है उन्हें  मनुष्य अपनी ज्ञान इन्द्रियों से देख या अनुभव कर सकता हैं। जिन ज्ञानेन्द्रियों से वह विषय ग्रहन करता है उन्हें कर्ण, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका कहते है। कर्ण से शब्द सुनाई देता हैत्वचा से स्पर्श ज्ञान होता है, नेत्र से रुप दिखाई देता है, जिह्वा से स्वाद मालुम होता है और नासिका से गंध मिलती है। इस प्रकार मनुष्य जगत् की वस्तुओ का अनुभव इन पाँच इन्द्रियों से करता है और इन्द्रिय सुख की तृप्ति  के लिए विषयों का संग्रह अधिक से अधिक मात्रा में करता रहता है इन्द्रिय सुख का अनुभव कर वह इस भ्राँति में पड़ जाता है कि इन पाँचों इन्द्रियों को तृप्त करना ही सच्चा सुख है उनकी कामना और पूर्ति अधिक से अधिक करनी चाहिए  किन्तु दुर्भाग्य से इन्द्रिय तृप्ति से होने वाला सुख नशवर है

3) प्रश्न -  ऐसा क्यों है ?

उत्तर -  पहले हम यह देखे की मनुष्य जब इन्द्रिय संवेदना प्राप्त करता है तो क्या होता है ? पहले जगत् की वस्तु का सम्पर्क इन्द्रिय से होता है और संवेदना उत्पन्न होती है। वह संवेदना मन तक पहुँचती है। मन भी भौतिक है किन्तु वह शरीर की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म है। मन संवेदना को बुद्धि के सामने प्रस्तुत करता है।बुद्धि मन से अधिक सूक्ष्म है। बुद्धि में विवेक शक्ती है और यह बौद्धिक शक्ती मनुष्य में ही उपलब्ध है। इस विवेक-बुद्धि के कारण ही मनुष्य अन्य प्राणियों से अधिक श्रेष्ठ है। इसीलिए वह ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना कहलाता है। विवेक वह शक्ति है जिससे शुभ-अशुभ, सत्य-असत्य का भेद दिखाई देता है। संवेदना बुद्धि को प्राप्त होती है, बुद्धि उस पर निर्णय लेती है और अपना निर्णय मन को बता देती है। मन वह आदेश शरीर को पहुँचा देता है। शरीर उसी के अनुसार क्रिया करता है।   

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