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इस
जगत में जिसमें हम रहते हैं, दो तरह की सत्तायें हैं।
निरीक्षण की दृष्टि सें देखें तो एक है निर्जीव और एक है
सजीव। पत्थर, मिट्टी, अग्नि और आकाश, पर्वत, नदियाँ ये सब
निर्जीव सत्ता में आते हैं। इनमें जीवन नही है,
संवेदनशीलता नहीं है, विचार की क्षमता नही है। इनको आप
कहेंगे-निर्जीव सत्ता, इनके साथ हम रह रहे हैं।
दूसरी सत्ता है सजीव सत्ता, जिसमें जीवन है, जिसमें अनुभव
की क्षमता, विचार की क्षमता, संवेदनशीलता है, इनको
हम कहेंगे, सजीव सत्ता। इस जगत में निरीक्षण की दृष्टि सें
देखें तो दो भाग हो जाते हैं एक निर्जीव और एक है सजीव
सत्ता।
निर्जीव
सत्ता का विचार नही करते। आइये सजीव पर जरा एकाग्र हों।
सजीव सत्ता कितने प्रकार की है हमारे सामने। अगर गणना करें
तो लगता नहीं इसका कुछ है। वनस्पति शास्त्र के लोगों ने,
दैहिक शास्त्र के लोगों ने, लगभग
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हजार योनियाँ गिन डाली हैं। लेकिन यह तो विस्तार की गणना
है। आपके ऋषियों ने ऐसा कहा है कि इस जगत् में चौरासी लाख
योनियाँ हैं। आप इनका विभाजन देखिये। जो विभाग उन्होंने
किया, वह स्रोत को देखकर, आपके ऋषियों ने इतने असंख्य
जीवों को चार भागों में बाँटा।
पहला स्रोत है पृथ्वी से निकलते हुए,
पृथ्वी तोड़ते हुए उद्विभज। वे सारे के सारे जीव उद्विभज
कहलाते है जो पृथ्वी का भेदन करके आते है। इस श्रेणी में
सारा वनस्पति शास्त्र सम्मिलित हो जाता है।
दूसरी सत्ता है, स्वेदज जो नमी,
आर्दरता से पैदा होते हैं। आप देखते हैं कि वर्षा ऋतु आती
है तो कितने जीव कहाँ से प्रकट हो जाते है, कुछ पता
ही नहीं चलता। वर्षा समाप्त हुई तो सारे लुप्त हो जाते
हैं। वर्षा आयी तो नाना रूप, नाना रंग, नाना आकार के कोई
उड़ने वाले, कोई रेंगने वाले प्रकट हो जाते हैं। जो स्रोत
है इनको प्रकट करने का, वह है स्वेदज। स्वेद माने पसीना
होता है लेकिन उसका व्यापक अर्थ है नमी से पैदा, आर्द्रता
से पैदा होना।
तीसरे प्रकार के जीव हैं अंडज। अंडे
से जो प्रकट होते हैं। समूचा पक्षी साम्राज्य इसमें
सम्मिलित हो जाता है।
चौथे प्रकार के जीव हैं उनको कहते हैं
जरायुज। जरायुज जो झिल्ली से पैदा होते हैं। जरायुज में
मनुष्य भी आता है और पशु भी। जरायुज में दो विभाग किये
गये
-एक
चतुष्पाद जिसे पशु कहते हैं दूसरा द्विपाद जिसे मनुष्य
कहते है। हम लोग इसी श्रेणी में आते हैं।
इतना सुविस्तृत जगत हमारे सामने है।
नाना प्रकार के जीव है। इसमें कोई बहुत शक्तिशाली है,
और कोई एकदम से असहाय है। लेकिन जो मनुष्य नाम का जीव है
वह सृष्टि का शासक है। मूलत:
देखा जाय तो मनुष्य
थलचर है, जमीन पर चलता है। लेकिन जलचर और नभचर भी
है। नभ में किसी भी पक्षी से तेज उड़ सकता है। जल में किसी
से भी तेज जा सकता है। वह पृथ्वी पर किसी से भी तेज चल
सकता है। तीनों जो माध्यम हैं उनमें उसकी गति है। इतना ही
नही जल सम्पदा का दोहन करता है। पृथ्वी में जो खनिज है
उसका दोहन करता है। वनस्पति को अपने ही हिसाब से प्रयोग
करता है। और इस सृष्टि में बलशाली जो जीव है, वे उनकी
आज्ञा में रहते है।
मनुष्य का बल क्या है
?
यह विचारणीय है। मनुष्य के पास
वह वस्तु क्या है जिसमे कारण वह सृष्टि का शासक बन बैठा
है। यद्यपि देह दृष्टि से, शरीर दृष्टि से वह निर्बल है।
आपके घर में या पड़ोसी के घर में कोई
अलसेसियन हो तो वह ज्यादा प्रबल होगा। अगर कुद्भ हो तो
हमें भागना होगा अन्यथा हम धायल होंगे। किसान के दरवाजे पर
बंधा बैल किसान से अधिक प्रबल और शक्तिशाली। घोड़े, हाथी
साधारण से साधारण जंगल के जीव उससे अधिक रफ टफ हैं। ऋतुओं
को अधिक से अधिक वरदास्त कर सकते हैं लेकिन शासन आपका है।
आज्ञा आपकी
चलती है। क्यों
?
वह क्या बल है आपके पास
?
और सीधा
-
साधा इसका उत्तर निकलता है, मनुष्य के पास विचार शक्ति है,
बुद्धि है, जो औरों के पास कम है और कमतर होती जाती है,
तो आपका जो सबसे प्रमुख बल है उसपर ध्यान देना चाहिए।
मनुष्य का बल है बुद्धि। मनुष्य का बल बलिष्ठ भुजायें नही
है। बल हो तो अच्छी बात है, पर उसका मूल बल वह नहीं है।
भारत की कितनी बड़ी सेना है उसका सेनापति एक बुजुर्ग आदमी
है। हम जहाँ रहते है हिमांचल प्रदेश में वहाँ एक जगह योल
है, पठान
-
कोट है, धर्मशाला है। सबके सब
मिलिट्री बेस है। आफिसर जो मिलने आते है उनके अंगरक्षक
होते हैं साढ़े छः फुट के और वे खुद कोई खास नहीं। लेकिन
कोई मेजर है, कोई जनरल है।
बल क्या है
?
आपका मूल सौन्दर्य क्या है
? उसकी उपेक्षा कभी
नही होनी चाहिये। उसको पहचानना चाहिये। उसको रिकग्नाइज
करना चाहिये। जो मधुमक्खी आज से पाँच हजार वर्ष या पाँच
लाख वर्ष पहले जिस प्रकार अपना घर बनाती थी, बनाती आ रही
है। जो पक्षी जैसा घोसला बनाता था, आदि काल से वैसा ही
घोसला आज भी बनाता है। और आप, आपकी तो रोज ही आकृति
बदलती है, पद्धति बदलती है। उनका यहाँ जो जिस तरह चलता था,
उठता
-
बैठता था, वैसे ही चलते हैं। आपके रोज वाहन बदलते हैं।
उनके यहाँ कोई क्लासरुम नहीं, कोई विद्यालय नहीं, कोई
महाविद्यालय नहीं, कोई पुस्तकालय नहीं । आपके यहाँ इनकी
भरमार है। उनके यहाँ कोई प्रयोगशाला नहीं , आपके यहाँ है।
क्यो यह फर्क है
? किसने किया यह
फर्क
? वो एक ही चीज है
जो आपको विशिष्टता प्रदान करती है।
हमें किसी दैहिक शास्त्री ने बताया
बाँयोलाजी के अनुसंधानकर्ता ने कि मनुष्य और पशु में जो
अन्तर है वह यह है कि मनुष्य की जो रीढ़ की हड्डी
है वह कप्स में है और बाकी लोगों की सीधी एक होती है।
मनुष्य और पशु में यही अन्तर है। ऋषि लोग यह भेद नही करते।
यह तो हड्डीयों का भेद है। असल जो भेद है वह तो दिमाग का
भेद है। तो इसको हम सबको पहचानना चाहिये।
बुद्धि हमारा मूल है ठीक है। इस
बुद्धि का चारा क्या है। क्या खाकर यह बुद्धि प्रबल से
प्रबलतर, प्रबलतर से प्रबलतम होती है। देह को तो हम जानते
हैं क्या इसको मिलना चाहिये। बुद्धि का भोजन क्या है?
बुद्धि को प्रबल बनाने का
साधन क्या है ?
उसका नाम है अध्ययन। यह आपका विषय है।
बुद्धि जो बढ़ती है, बुद्धि जो तीक्षण होती है -
बुद्धि जो किसी खास क्षेत्र में उपलब्धि करती है। उसका एक
ही आहार है, वह अध्ययन ही है। जितना गहरा जिसका अध्ययन
होगा अपने क्षेत्र में वह उतना ही कुछ प्राप्त करेगा।
बुद्धि तो हमारा मूल बल है, उसको बलशाली बनाने के साधन का
नाम अध्ययन है।
हम देह के प्रति तो बड़ी सचेष्ट रहते
है, किन्तु बुद्धि के प्रति सचेष्ट नही है, यह हमारी
विडम्बना है। ऐसा नहीं होना चाहिये। देह के प्रति हमें
बिल्कुल पता है कि क्या खाना है, कैसे रहना है, लेकिन
बुद्धि के प्रति हम लापरवाह रहते हैं। कालिदास की कथा याद
आती है, तो हम हँसते है।
आपने सुना होगा कि कालिदास पहले बहुत
बड़े मूर्ख थे। जिस डाल पर बैठते थे उसी को काटते थे। हम
लोग भी कभी युनिवर्सिटी में रहे उस समय तो हमें समझ में
नही आया। लेकिन किसी ने जब इशारा किया तो समझ में आया कि
हम भी ऐसे ही हैं। हम जिस गाड़ी में बैठते हैं उसको तोड़ते
हैं। यह कालिदास नहीं तो और क्या है। जहाँ बैठना है, जो
हमारा आधार है, जिस पर बैठकर हम कुछ सीखते है उसी को नष्ट
करते है और हम कालिदास पर हँसते हैं। हमारे ऊपर कालिदास
हँसते होंगे कि बेटा आप हमारे ही शिष्य हो।
हमें बुद्धि
की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और उपेक्षा नहीं करने का मतलब
है अध्ययन के प्रति सचेत रहना। उसके प्रति गम्भीरता होनी
चाहिये, गहरी रुचि होनी चाहिये। वह आपका मूल बल है। आपके
सारे विकास का, मानवता के विकास का आधार है। और मैं एक चीज
और जोड़ता हूँ। केवल अध्ययन बुद्धि का भोजन नहीं है।
ऋषियों ने पहचाना है और आपको भी इशारा करुँगा तो शायद आप
मान लेंगे। रावण का अध्ययन बड़ा गहरा था लेकीन वह
कल्याणकारी नहीं था।
बड़े -
बड़े विद्धान होते हैं इस सृष्टि में जिनका अध्ययन बड़ा
गहरा होता है, लेकिन उनकी दिशा अशुद्ध होती है
अनुचित होती है। तो बुद्धि का अध्ययन शुद्ध हो और उसकी
दिशा स्वस्थ हो, यह दोनों आवश्यक हैं। उस दिशा को कौन तय
करता-बुद्धि की दिशा का निश्चय कौन करता है। केवल अध्ययन
नहीं। हमारा इतिहास कहता है कि बड़े - बड़े विद्धान लोग
हुए इस सृष्टि में , इतिहास
में लेकिन उनकी दिशा खराब थी। उन्होंने संसार को
बहुत परेशान किया। बुद्धि की दिशा तय करता है, पुरानी भाषा
में कहें तो सत्व गुण, रजो गुण, तमो गुण। तो ऋषियों की
मांग यह है कि हमारा अध्ययन गहरा हो और बुद्धि सात्त्विक
हो। बुद्धि राजसिक होगी तो गड़बड़ है। बुद्धि तामसिक होगी
तो गड़बड़ है, अध्ययन चाहे जितना हो। अगर हम कुछ बनना
चाहते हैं, तो एक तरफ हमें अध्ययन का ध्यान रखना है दूसरी
तरफ हमें उसमें सात्त्विकता बनी रहे, उसकी दिशा स्वस्थ हो
इसका भी ध्यान रखना है। सो कैसे होगा ?
बुद्धि में सात्त्विकता का आविर्भाव
कैसे हो ?
सात्त्विकता प्रबलतम् कैसे हो?
इसके लिए आपको अपने पुराने ग्रंथ
पढ़ने चाहिए। यह जो आपका पाठ्यक्रम उसके अलावा आपको गीता,
आपके उपनिषद् , आपका रामायण यह सब पढ़ना चाहिये। वहाँ यह
विद्या है। वहाँ यह कला दी गई है।
बुद्धि को सात्त्विक कैसे रखे ?
एक उसका तरीका यह है कि बुद्धि का
आहार ठीक हो। आहार माने पाँचो इन्द्रियों से जो हम भीतर
डालते है उसको बोलते है आहार। हमारी जो आँखे भोजन करती है
यदि वह तामसिक हैं तो बुद्धि सात्त्विक कैसे होगी ?
यदि हमारा कान आहार करता है तामसिक
तो, किसी की निन्दा किसी की की ये किसी की वो तो बुद्धि
सात्त्विक कैसे होगी ?
यदि जिह्ववा का आहार तामसिक हो तो
बुद्धि कैसे सात्त्विक होगी।
यह जो इन्द्रियाँ हैं वे आहार कराती
हैं। केवल भोजन आहार नहीं है। तो बुद्धि को सात्त्विक
बनाने के लिये थोड़ा अपने आहार पर, पाँचो इन्द्रियों के
आहार पर अपने आप पर ध्यान रखना चाहिये। इससे बड़ा कल्याण
हो सकता है। सत ग्रन्थ पढ़ने चाहिये यह बुद्धि को
सात्त्विक बनाने में, उसके स्वच्छ, स्वस्थ, सही दिशा देने
में निर्णायक हैं।
अपने क्षेत्र का अध्ययन गहरा हो। मनुष्य का वैभव उसकी
बुद्धि में ही है और ऐसा कोई बुद्धिमान व्यक्ति इस सृष्टि
में जब जब आया है सृष्टि उससे धन्य हो गई
है। सृष्टि का कल्याण हुआ है। जितने महापुरुषों को
आज हम याद करते हैं इसी नाते करते हैं। इस नाते नही करते
कि वे बहुत खूबसूरत थे। देह की खूबसूरती क्या थी ?
उसका पहनावा क्या था ?
लेकिन हम उनको याद करते हैं। अन्त में आग्रह केवल यही है
कि बुद्धि को समझें उसके प्रति सचेत रहें। वह आपका मूल बल
है। उसको और बलवान बनाने के लिये अध्ययन होना चाहिये,
उसको सात्त्विक बनाने के लिये सत ग्रन्थों के पास जाये।
आहार तय करें।
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