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प्रवचन

माण्डूक्य उपनिषद्

(परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी के माण्डूक्य प्रवचनों से)

 

 

      यह अथर्व वेद का उपनिषद् है । उपनिषदों का प्रतिपाद्य विषय आत्मा और ब्रह्म के एकत्व का बोध कराना है। यह तो तब हो जब पहले आत्मा का बोध हो तब परमात्मा का बोध हो तब ब्रह्म का बोध हो । उपनिषदों में आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने की विभिन्न प्रक्रियाएँ हैं। इस उपनिषद् में अवस्थात्रय विवेक की प्रक्रिया को लिया गया है। जो चेतना तीनों अवस्थाओं में विद्यमान है भोक्ता नहीं बनती वह आत्मा है, परमात्मा है ।

 

परमात्मा को ह्रदय में प्राप्त किया जाता है। ह्रदय ही नहीं मिला तो परमात्मा कहाँ मिल जायेगा ? कभी-कभी ह्र्दय में पहुँचे भी तो अंधेरा दिखता है, जैसे  बाहर से आओ तो कमरे में अंधेरा दिखता है, परंतु थोड़ी देर वहाँ रुको तो कुछ-कुछ दीखने लगेगा । इसी प्रकार अपने ह्रदय में थोड़ी देर टिकने का अभ्यास करो वहाँ थोड़ी देर में Thoughts एक के बाद दूसरे आते दिखाई देंगे, अब समझो कुछ उजाला अन्दर हो रहा है वर्ना ये वृत्तियाँ कैसे दिखतीं ? जिन्होंने ह्रदय में रुकने का अभ्यास किया है वे ही उपनिषद् का ज्ञान समझ सकते हैं, क्योंकि उपनिषद् में ह्रदय के अन्दर की बातें हैं । उपनिषद् का ज्ञान अनुभव आधारित है । परम्परागत पढ़ाई में यह अनुभव में आना चाहिए । मानो बोले कि यह शरीर मैं नहीं हूँ तो व्यक्ति को ऐसा ही दिखाई भी देना चाहिए । जब अन्य लोगों के अनुभव को हमने तर्क के द्वारा सही जाना तो हमारा अनुभव भी ऐसा ही होना चाहिए।

 हमें जो लगता है कि शरीर मैं हूँ तो यह भ्रान्ति है । भ्रान्ति दो प्रकार की होती है 1) सविकल्प भ्रान्ति इसकी विशेषता है कि ज्ञान होने पर भ्रान्ति नहीं दिखती जैसे कि रस्सी में सर्प समझ लिया परन्तु रस्सी का ज्ञान होने पर सर्प नहीं दिखेगा । 2) निर्विकल्प भ्रान्ति इस भ्रान्ति में ज्ञान होने के बाद भी भ्रान्ति दिखती रहती है जैसे कि आकाश गोल और नीला दिख रहा है तर्क के द्वारा जान लेने पर भी कि आकाश गोल और नीला नहीं है, हमें आकाश गोल और नीला ही दिखता है ।

 ऐसे ही शास्त्र प्रमाण से ज्ञात हो गया कि मैं यह शरीर नहीं हूँ फिर भी लग रहा है कि शरीर ही मैं हूँ (यह निर्विकल्प भ्रान्ति है) परन्तु लगने से घबड़ाओ नहीं , बुद्धि में ढृढ़ निश्चय रखो कि शरीर मैं (आत्मा) नहीं हूँ मैं सतचिदानन्द स्वरुप आत्मा हूँ । आत्मा जब तीनों शरीर के द्वारा व्यक्त (प्रतिबिम्बित) होती है तो अनंत होते हुए भी परिच्छिन्न लगती है । यही चिदाभास है । चिदाभास में जो अहं (“I” ness) का भाव है वही जीव है। यदि परिच्छिन्नता टूट जाये तो यही अहं (जीव) आत्मा है अपना स्वरुप है । उसका न आदि है न अन्त!

माण्डूक्य उपनिषद् में कुल 12 मंत्र हैं तथा इनमें बहुत गम्भीरता है इनकी गम्भीरता तो तब ज्ञात हो जब गोड़पादाचार्य (शंकराचार्य के दादा गुरु) की कारिका (श्लोकों में व्याख्या) देखी जाये । कारिका को चार भागों में बाँटा गया है। आगम प्रकरण, वैतथ्य प्रकरण, अद्वैत प्रकरण तथा अलातशान्ति प्रकरण ।

आगम प्रकरण में वस्तु का निर्देश, तथा प्रपंच का मायामयत्व स्थापित किया गया है । वैतथ्य प्रकरण में आगम में कही हुई बात (द्वैत का अभाव) को ही तर्क पूर्वक समझाया गया है । अद्वैत प्रकरण में अद्वैततत्त्व को युक्ति द्वारा सिद्ध किया गया है एवं अलातशान्ति प्रकरण में आचार्य ने अन्य मतावलम्बियों के पारस्परिक मतभेद दिखलाते हुए उन्हीं की युक्तियों के द्वारा उनका खन्डन किया है ।

शंकराचार्य जी ने देखा कि माण्डूक्य तो आसानी से लोगों को समझ में आयेगा नहीं और गौड़पदाचार्य की कारिका भी गम्भीर है इसलिए उन्होंने उपनिषद् एवं कारिका दोनों पर व्याख्या लिखी । इसे पढ़ कर कुछ प्रकाश होता है । परन्तु बिना गुरु से समझे सही अर्थ समझ में नहीं आता । अर्थ समझ में आया इसका प्रमाण है कि आत्मा ब्रह्म की एकता का अनुभव, आनन्द का अनुभव बिना साधनों के हो । मम दरसन फल परम अनूपा जीव पाव निज सहज स्वरुपाजब आत्मा और ब्रह्म एक हैं तो आत्मा के ज्ञान से ब्रह्म का ज्ञान हो गया । अपने स्वरुप की प्राप्ति सतस्वरुप की प्राप्ति, चेतनस्वरुप की प्राप्ति, आनन्दस्वरुप की प्राप्ति हो गई । यही मुक्ति है, समस्त दुखों का अन्त है । 

उपनिषद् तो परमात्मा का ही वचन है- वेदान्तकृद्वेविदेव चाहम”  -  तो वेद उपनिषद् तो अपौरुषैय हो गये । आचार्य ने भाष्य भी उसी औपनिषिदिक ज्ञान में स्थित होकर लिखे हैं ।

 उपनिषद् के पहले 6 मंत्रों पर केवल भाष्य है और बाकी सब मंत्रों पर कारिकाऐं हैं । गौड़पदाचार्य जी की कारिकाऐं ऐसी हैं कि अद्वैत मत की होते हुए भी बाकी सभी सम्प्रदाय के लोगों ने उन्हें स्वीकारा है ।

 साधकों को शान्त एकाग्र होकर, बुद्धि को उपासना, वैरागय इत्यादि से सूक्ष्म बनाकर उपनिषद् को समझने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए आचार्य पहले शांति प्रार्थना करते हैं । वे कहते हैं कि जीवन की विभीषिकाएँ, दोष, दुर्गुण हमारे सामने न पड़े । हम स्वयं उत्तम शान्त जीवन जियें, हमें सत्पुरुषों का साथ प्राप्त हो। उनके सुन्दर कार्य हमें देखनें को मिलें । धार्मिक रूप से अनुकूल वातावरण प्राप्त हो । ऐसे शांत वातावरण में रहकर ही उपनिषद् का अध्ययन करने पर वह समझ में आयेगा। ऋषि समस्त देवताओं से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारी आध्यात्मिक साधना में आने वाली सब बाधाओं को दूर करें और हमारा कल्याण करें। मंगलाचरण में उस परमात्मा को नमन करते हैं । परन्तु वह परमात्मा कौन है, यह भी बताते हैं ।

 यहाँ  परमात्मा को प्रज्ञान नाम दिया । ज्ञान जो प्रकर्ष है, जो परम शुद्ध चेतना है वह प्रज्ञान है । वही शुद्ध चेतना जब शरीर, मन, बुद्धि, प्राण आदि से प्रतिबिम्बित होती तो शुद्ध नहीं रही मायामय हो गई । चेतना के आवरणों को हम अलग हटावें तो वह जो वास्तविक चेतना है उस चेतना को प्रज्ञान कहते हैं । ज्ञान में तो ज्ञाता-ज्ञेय का द्वैत है और किसी साधन (इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि) के द्वारा ज्ञान होता है । परन्तु प्रज्ञान में द्वैत नहीं है वह तो अपनी सत्ता का बोध है जो बिना साधन के है जैसे सूर्य का स्वयं का प्रकाश । हम ज्ञान में ही इतने उलझे रहते हैं कि वास्तविक चेतना (आत्मा) की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता । जहाँ उपकरणों को अलग करके रखा, शुद्ध चेतना (प्रज्ञान) तक पहुँचे तो श्रुति कहती है कि यही ब्रह्म है । उस प्रज्ञान (परमात्मा) की किरणें ही सारी सृष्टि में कहीं मंद कहीं प्रकर्ष फैल रहीं हैं ।

 यहाँ यह शंका उठ सकती है कि सूर्य तो एक देशिय वस्तु है इसलिए उसमें से किरणें निकलती हैं लेकिन यह प्रज्ञान तो अनन्त है देश, काल,वस्तु अपरिच्छिन्न है, सर्वत्र पहले से ही व्याप्त है तो उसमें किरणें कहाँ सम्भव हैं ? यहाँ पर यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि प्रज्ञान में वास्तव में किरणें हैं नहीं केवल किरणों के समान हैं । व्यवहार काल में हम सब जो चेतना का अनुभव कर रहे हैं हमारे मन में चेतना, दूसरे सब व्यक्तियों में जो चेतना है वह सब प्रज्ञान की किरणें हैं । अर्थात चिदाभास ही किरणें हैं । पत्थर और जल तक में परमात्मा की चेतना अधिष्ठान के रूप में व्याप्त है ।

 यह प्रज्ञान ऐसी व्यापक चेतना है जो समस्त लोंको (अनुभव के समस्त क्षेत्रों) में व्याप्त है, अर्थात यह जाग्रत में तो है ही परन्तु स्वप्न में भी है और सुषुप्तावस्था में भी है । सूर्य की किरणें वहाँ तक नहीं पहुँचतीं न तत्र सूर्यों भाति न चन्द्र तारकं ये जग्रत अवस्था तक ही है। स्वप्न की वस्तुऐं सूर्य के नहीं वरन चेतना के प्रकाश में दिखती हैं । जाग्रतावस्था के पदार्थ स्वप्न, सुषुप्ता में नहीं पहुँचते परन्तु परमात्मा वहाँ भी विद्यमान है । प्रज्ञान वहाँ भी उस अवस्था को प्रकाशित कर रहा है । व्यष्टि में  या समष्टि में जितने भी अनुभव के क्षेत्र हैं उन सबका मूल प्रकाशक होकर जो विद्यमान है वह प्रज्ञान है ।

 परमात्मा की व्यापकता ऐसी है कि कहीं भी उसका अभाव नहीं मिलता । जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ता और तुरीय इस प्रकार अनुभव के सब क्षेत्रों में वह व्याप्त है । परमात्मा ज्ञाता (बुद्धि आदि) और ज्ञेय दोनों को ही प्रकाशित करता है । परमात्मा और जगत के बीच व्यापक और व्याप्य का सम्बन्ध भी एक विशिष्ट प्रकार का है ।

                (प्रस्तुतिकरण-मंजु त्यागी)