मणिरत्नमाला
प्रश्नोत्तरी एक अपने ही प्रकार की रचना है। पहले श्लोक से प्रतीत होता है कि एक शिष्य अपने गुरु के पास जा कर अपने संसार-सागर के दुःखों से पार जाने का मार्ग पूछता है। उसका प्रश्न सामान्य रूप से हम सबका प्रश्न है। हम सभी लोग अपने-अपने संसार-जाल में फॅसे हुये हैं। उसमें पडे हम लोग बरबस दुःख भोग रहे हैं। अपने प्रयत्न से हर व्यक्ति सुखी होने का प्रयास करता है, किन्तु उसे कितनी सफलता मिलती है, यह तो वही जानता है। कभी-कभी कुछ लोग अपने जीवन-पथ पर एक क्षण रुक कर अपने जीवन का पुनर्निरीक्षण करते हैं और सन्तुष्ट न होने पर उस व्यक्ति के पास जाते हैं तो सदा प्रसन्न दिखाई देता है।
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