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मैं
सब कुछ नही हूँ, मुझ में और जगत की अन्य वस्तुओं में
भेद है - इस तरह का असर्वात्म भाव अज्ञान के कारण है। अत:
उपाधिजनित मिथ्या ज्ञान से आरोपित उपाधियों का बोध कर जो
ऐसा अनुभव करता है कि मैं जिसमें संसार धर्मों की गन्ध भी
नहीं है ऐसा अन्तर - बाह्य शून्य शुद्ध ब्रह्म ही हूँ,
वह अविद्याकृत असर्वत्व की निवृत्ति
हो जाने से ब्रह्मज्ञान द्वारा सर्व हो जाता है।
महान प्रभावशाली वामदेव
आदि अथवा मन्दवीर्य आधुनिक पुरुषों
में ब्रह्म अथवा उसके विज्ञान का कोई अन्तर नहीं है।
इसके
अतिरिक्त यह भी घ्यान रखना चाहिए कि आत्मभाव के बाद
कालक्रम से सर्वात्म-भाव की उत्पत्ति होती हो - ऐसा नहीं
है। जैसे आत्मज्ञान के साथ अविद्या की निवृत्ति होती है
वैसे ही आत्मज्ञान के साथ सर्वात्मभाव की भी उपलब्धि होती
है। तात्पर्य यह है कि आत्मज्ञान के बाद इस बात की
प्रतीक्षा नही करनी पड़ती कि अब सर्वात्मभाव प्राप्त होगा। दोनों की साथ साथ उत्पत्ति
होने के कारण सर्वात्मभाव को आत्मज्ञान की कसौटी मान सकते
है।
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