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मनुष्य अपने जीवन में जो
कुछ प्राप्त कर सकता है उसे पुरुषार्थ कहते हैं। पुरुषार्थ दो प्रकार का है-
अभ्युदय और नि:श्रेयस। अभ्युदय के अन्तर्गत भौतिक उन्नति आती है। उसे तीन भागों
में बाँट सकते हैं - धर्म, अर्थ और काम। इस लोक में या स्वर्ग आदि उच्च लोकों में इन्हीं को
प्राप्त किया जा सकता है। ये सब उपलब्धियाँ कर्म-साध्य और नश्वर हैं। नि:श्रेयस
परम पुरुषार्थ है। उससे नित्य आनन्दस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति होती है। इस
अवस्था में पुनर्जन्म के क्लेश नहीं रह जाते। इसे मुक्ति कहते हैं। मुक्ति
प्राप्त करने के लिए हमारे अन्दर कुछ योग्यता होनी चाहिए। यहाँ उसका वर्णन किया
जाता है।
साधनचतुष्ट्य संपन्न
अधिकारिणां मोक्षसाधनभूतं
तत्त्वविवेक प्रकारं
वक्ष्याम:।
हम उस प्रकार के
तत्त्वविवेक का वर्णन करते हैं जो साधनचतुष्ट्य से सम्पन्न अधिकारी पुरुषों के
लिए मोक्ष का साधनस्वरूप हैं।
व्याख्या - कर्मों, परिस्थितियों, व्यक्तियों और वस्तुओं की परतन्त्रता में जीवन जीना दु:खमय है। हर
व्यक्ति स्वभाव से सुखमय जीवन जीना चाहता है। सुखी रहने के लिए उसे परतन्त्रता
त्याग कर स्वतन्त्र या मुक्त हो जाना चाहिए। किन्तु स्वतन्त्र होने के लिए
स्वेच्छाचारी बनना उचित नहीं है। स्वेच्छाचारी मनुष्य मनोवैज्ञानिक दृष्टि से
असामान्य होता है मुक्त नहीं। उससे न वह सुखी होता है, और न उसका समाज। भारतीय अध्यात्मविद्या का यह भली-भाँति परीक्षा किया
हुआ निर्णय है कि मनुष्य को यथार्थ रूप में स्वतन्त्र या जीवन्मुक्त होने के
लिए अपने विकसित विवेक का प्रयोग करना चाहिए। वही मोक्ष का साधन है। आगे
बतायेंगे कि किस प्रकार के विवेक से मनुष्य जीवन आनन्दमय बन सकता है। यहाँ पहले
यह बता देना आवश्यक है कि तत्त्वविवेक का उदय उन्हीं पुरूषों को हृदय में होता
है जो साधन चतुष्ट्य से सम्पन्न हैं। इसलिए तत्त्वविवेक का अधिकारी बनने के लिए
चार महत्वपूर्ण गुणों को जानना और अपने में विकसित करना चाहिए।
अत:
प्रश्न है-
साधनचतुष्ट्यं किम् ?
नित्यानित्यवस्तु विवेक:
इहामुत्रार्थफलभोग विराग:
शमादिषट्संपत्ति
मुमुक्षुत्वं चेति !
चार साधन क्या हैं ?
(1)
नित्य और अनित्य वस्तु का विवेक,
(2) इस लोक और परलोक
में अपने कर्मों के फलभोग से वैराग्य,
(3)
शम आदि छ:
सम्पत्तियाँ और (4)
मुमुक्षत्व (यही चार साधन चतुष्ट्य कहलाते हैं)।
व्याख्या - साधन चतुष्ट्य के अन्तर्गत विवेक
वैराग्य षट्सम्पत्ति और मुमुक्षत्व आते हैं। ये गुण सभी मनुष्यों में थोडी
मात्रा में होते हैं। किन्तु एक विशेष स्तर तक विकसित होने पर ये गुण मनुष्य को
अध्यात्मविद्या का अधिकारी बना देते हैं। भला-बुरा,
हानि-लाभ,
शुभ-अशुभ
का भेद विवेक है। घर की एक अशिक्षित बालिका को भी कुछ विवेक है। वह घर का कूडा
झाड कर बाहर फेंक देती है, क्योंकि वह अनुपयोगी है। वह उपयोगी वस्तुयें घर में
संभालकर रखती है। जब यह विवेक शक्ति बढकर नित्य और अनित्य का भेद करने लगे तो
वह अध्यात्म विद्या में सहायक होती है।
वैराग्य भी हम सब में होता
है। तभी हम अनुपयोगी वस्तुओं का संग्रह नहीं करते। किन्तु जब सभी कर्मफलभोग में
दोष दिखाई देने लगे और हृदय से उनका त्याग कर दें तो ऐसा वैराग्य मुमुक्षु के
लिए उपयोगी है। षट् सम्पत्तियाँ शम, दम, उपरति, तितिक्षा,
श्रद्धा और समाधान हैं। मोक्ष प्राप्त करने की प्रबल इच्छा मुमुक्षत्व है। अब
इन चारो गुणों को अधिक स्पष्ट करते हैं।
नित्यानित्यवस्तुविवेक:
क:
?
नित्यवस्तु एकं ब्रह्म
तद् व्यतिरिक्तं सर्वम्
अनित्यम्
अयमेव
नित्यानित्यवस्तुविवेक: ।
नित्य और अनित्य वस्तु का
विवेक क्या है?
एक
ब्रह्म ही नित्य वस्तु है। उसके अतिरिक्त सब अनित्य है। यही नित्यानित्य वस्तु
विवेक है।
व्याख्या - जो वस्तु थोडे
या अधिक काल में नष्ट हो जाती है, उसे अनित्य कहते हैं। हम अपने अनुभव से कुछ वस्तुओं को नष्ट होते देखते
हैं, जैसे खेत में
धान की उगती, पकती
और नष्ट होती फसल। वह अनित्य है। उसकी अपेक्षा पृथ्वी, सूर्य,
चन्द्र, आदि नित्य
प्रतीत होते हैं। उन्हें नष्ट होते हमने नहीं देखा। किन्तु विचार करने पर ज्ञात
होता है कि जो वस्तु किसी काल में उत्पन्न होती है और जिसका कोई नाम-रूप है वह
नश्वर है। इस दृष्टि से विचार करने पर ज्ञात होता है कि सूर्य, चन्द्र आदि भी अनित्य हैं। नित्य वस्तु केवल ब्रह्म है। वह अनादि, अनन्त,
नामरूप रहित और काल से परे है। इसका विस्तृत वर्णन आगे किया जायेगा। जब बुद्धि
में यह निश्चय हो जाये कि ब्रह्म ही नित्य है, शेष सब कुछ अनित्य है तो इसे पूरा विवेक कह सकते हैं।
विराग:
क:
?
इहस्वर्ग भोगेषु
इच्छाराहित्यम् ।
विराग क्या है
?
इस लोक और स्वर्ग
लोक के समस्त भोगों को भोगने की इच्छा न रह जाना ही विराग है।
व्याख्या - नित्यानित्य वस्तु का विवेक होने पर हम स्वत:
नित्य वस्तु के प्रति प्रेम और अनित्य वस्तु के प्रति हेय या त्याग बुद्धि
उत्पन्न होने का अनुभव करते हैं। ब्रह्म के अतिरिक्त इस लोक की सभी वस्तुयें
अनित्य है और उसी प्रकार स्वर्ग आदि उच्च लोकों की वस्तुओं से मिलने वाला सुख
भी अनित्य है और उसके साथ दु:ख
भी मिला है। इसलिए उनसे सुख की आशा त्याग देना वैराग्य है। राग बाँधने वाला है
और वैराग्य मुक्ति देने वाला है। विरक्त होने पर ही हम नित्य वस्तु ब्रह्म को
प्राप्त करने के लिए आगे बढ सकते हैं।
शमादि साधनसंपत्तिः का
?
शमो दम
उपरमस्तितिक्षा श्रद्धा समाधानं च इति ।
शम आदि साधन
सम्पत्ति क्या हैं?
शम,
दम, उपरति, तितिक्षा,
श्रद्धा और
समाधान ही षट्सम्पत्तियाँ हैं।
व्याख्या - शम
आदि छः गुण आध्यात्मिक साधक की वह सम्पत्ति है जिसके बल पर वह अनित्य जगत् से
विरक्त होकर नित्यतत्त्व की ओर अग्रसर होता है। इनके द्वारा उसका व्यक्तित्व
संगठित और सशक्त बनता है। उसमें अपने पर विश्वास जाग्रत होता है।
शम: क: ?
मनो निग्रह: ।
शम क्या है?
मन के ऊपर नियन्त्रण
प्राप्त करना ही शम है।
व्याख्या - मन विषयों की
ओर भागता और उन्हीं का चिन्तन किया करता है। वह सवेंगों से विक्षुब्ध हो जाता
है। ऐसा मन सूक्ष्म वस्तु का चिन्तन करने में बाधक होता है। इसलिए इसे
विचारपूर्वक नियन्त्रण में लाने का
प्रयास किया जाता है। इसमें सफलता मिलने पर मन अपने वश में हो जाता है। हम उसे
जब जहां लगाना चाहते हैं वहीं लगकर वह काम करता है।
दम:
क: ?
चक्षुरादि
बाह्येन्द्निय निग्रह:
।
दम क्या है ?
चक्षु आदि बाह्य
इन्द्नियों का निग्रह करना ही दम है।
व्याख्या -
इन्द्नियाँ दो प्रकार की हैं - ज्ञानेन्द्नियाँ और कर्मेन्द्नियाँ । पहले से
विषयों का ज्ञान होता है और दूसरे से उन विषयों को प्राप्त किया जाता है। जब
इन्द्नियाँ स्वतंत्र होकर विषयों में विचरण नहीं करती, वे
मन के वश में रहती हैं तो इसे दम कहते हैं। यदि पहले शम का अभ्यास हो जाता है
तो इन्द्नियों का दम करने में सहज की सफलता मिल जाती है। इसके विपरीत यदि
इन्द्निय निग्रह में कुछ सफलता मिल जाती है तो वह मन के निग्रह में भी सहायक
होती हैं।
उपरम:
क: ?
स्वधर्मानुष्ठानमेव ।
उपरामता क्या
है ?
अपने धर्म का
अनुष्ठान ही उपरामता है।
व्याख्या - हम
सब के अपने कुछ कर्तव्य हैं। अपने प्रति,
अपने
माता-पिता के प्रति,
अपने गुरु के
प्रति अपने परिवार और समाज के प्रति हमारे जो कर्तव्य हैं उनका पालन करना ही
धर्म है। अपने धर्म का दृढता से अनुष्ठान करने पर मन अधर्म, पाप या
दुराचार की ओर नहीं जाता। यह मन की उपरति है।
मनुष्य का परम
धर्म सत्य की खोज करना है। इस कार्य म दृढतापूर्वक लग जाने से मन अनित्य
वस्तुओं में सुख खोजने नहीं जाता। यह भी उपरति है। सामान्यत:
उपराम शब्द का प्रयोग वैराग्य के अर्थ में होता है।
तितिक्षा का ?
शीतोष्ण सुखदु:खादि
सहिष्णुत्वम् ।
तितिक्षा क्या है ?
गर्मी सर्दी, सुख-दु:ख आदि
द्वन्द्व सहन करने का स्वभाव तितिक्षा है।
व्याख्या - मनुष्य जीवन में
अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आना स्वाभाविक है। उन सब को रोका नहीं जा सकता।
अपनी सामर्थ्य भर प्रतिकूल स्थिति का निवारण कर जो कुछ अनिवार्य हो जाता है उसे
चिन्तारहित शान्त मन से सहन करने का अभ्यास होना चाहिये। अभ्यास से यह गुण
बढाया जा सकता है। तत्त्वचिन्तन करने में यह गुण भी सहायक होता है।
श्रद्धा कीदृशी ?
गुरुवेदान्त वाक्यादिषु
विश्वास:
श्रद्धा ।
श्रद्धा कैसी होती है ?
गुरु और वेदान्त के वाक्यों में विश्वास रखना श्रद्धा है।
व्याख्या - उपनिषद् वेदान्त ग्रन्थ हैं। उनके वचन स्वतः प्रमाण
हैं। वे निर्भ्रान्त सत्य का निरूपण करते हैं। गुरु ने उनकी सत्यता का अनुभव
अपने व्यावहारिक जीवन में किया है। इसलिए वह भी शिष्य के सामने उसी सत्य का
प्रतिपादन करता है। इन दोनों वचनों को सत्य स्वीकार करना श्रद्धा है। इसी के बल
पर साधक स्वयं भी उसी सत्य का साक्षात्कार करने के लिए अपना जीवन अर्पित कर
देता है।
समाधानं किम् ?
चित्तैकाग्रता ।
समाधान क्या है ?
चित्त की एकाग्रता की समाधान
है।
व्याख्या- अपने प्रिय विषय में सभी लोगों का चित्त एकाग्र होकर
लगा रहता है। किन्तु जब चित्त का यह गुण गुरु और शास्त्र वचन को समझने और अनुभव
करने के लिए काम आता है तो उसे समाधान कहते हैं। समस्त संशयों से मुक्त होकर जब
मन नित्य वस्तु में स्थिर हो जाता है तो भी यह समाधान है।
यहाँ षट् सम्पत्ति की गणना पूरी हुई। अब चौथा साधन मुमुक्षत्व
का वर्णन किया जाता है।
मुमुक्षत्वं किम् ?
मोक्षो में भूयाद्इति इच्छा
।
ममुक्षत्व क्या है ?
मुझे मोक्ष प्राप्त हो-इस
इच्छा का नाम मुमुक्षत्व है।
व्याख्या- यद्यपि सभी मनुष्य
अपने कर्म के बंधन में बंधे हैं, न चाहते हुए भी उन्हें अपने कर्मों का फल विवश
होकर भोगना पडता है। उसी बन्धन में बंध कर अनेक योनियों में भटकना और शरीर धारण
करना पडता है। किन्तु वे न यह जानते हैं कि इस बन्धन से छूटा जा सकता है और न
छूटने की इच्छा ही करते हैं। कुछ ही व्यक्ति अपनी कठिन समस्या से अवगत होते हैं
और उससे मुक्त पाने का प्रयास भी करते हैं। जैसे कोई व्यक्ति अपने सिर के लम्बे
बालों में लगी आग से व्याकुल होकर सरोवर में कूदने की इच्छा करता है वैसे ही
जीवन-दुःखों से व्यथित होकर जब मनुष्य उनसे मुक्त होने की इच्छा करता है तो उसे
मुमुक्षत्व कहते हैं। ऐसे ही लोगों के लिये वेदान्तशास्त्र है और ऐसे ही लोग
उनके अध्ययन से लाभान्वित होते हैं।
एतत् साधनचतुष्ठ्यम् ।
ततस्तत्त्वविवेकस्याधिकारिणो
भवन्ति ।
यही चार साधन हैं। इनसे
सम्पन्न पुरुष तत्त्वविवेक के अधिकारी होते हैं।
व्याख्या - यहाँ साधन
चतुष्ट्य का वर्णन पूरा हुआ। इन योग्यताओं से सम्पन्न व्यक्ति सत्स्वरूप
परमात्मा को खोजने और पाने का अधिकारी हो जाता है। जाति-पांति, स्त्री-पुरुष,
आयु आदि उसके लिए बाधक नह बन सकते। संसार में कहीं भी रहने वाला कोई व्यक्ति
विवेक आदि गुणों से अधिकारी बन कर और तत्त्वज्ञान पाकर मुक्त हो सकता है।
तत्त्व विवेक
(आत्मज्ञान)
साधनचतुष्ट्य
सम्पन्न पुरुष मुक्त होने के लिए तत्त्व विचार करता है। इसलिए अब तत्त्वविवेक
प्रारम्भ करते हैं।
तत्त्वविवेक:
क: ?
आत्मा सत्यं
तदन्यत् सर्वं मिथ्येति ।
तत्त्वविवेक
क्या है?
आत्मा सत्य है
और उसके अतिरिक्त सब कुछ मिथ्या है। यही तत्त्वविवेक है।
व्याख्या-
‘तत्त्व’ सत्
वस्तु है। उसे मिथ्या वस्तु से पृथक कर पहचान लेना तत्त्वविवेक है। इसके लिए
सत् और मिथ्या का भेद और उनके लक्षण ज्ञात होने चाहिए। सत् वह है जो भूत, वर्तमान
और भविष्य तीनों काल में यथावत रहे। उसमें न परिवर्तन हो और न उसका विनाश हो।
इसके विपरीत जो वस्तु तीनों काल में न हो उसे असत् कहते हैं, जैसे
बंध्यापुत्र। इसके अतिरिक्त कुछ वस्तु ऐसी भी होती है जो भासित होती है, तीनों
काल में परिवर्तित होती रहती हैं और नष्ट भी हो जाती है। इस प्रकार की सत्ता को
मिथ्या कहते हैं। यह जगत् ऐसा ही है। संक्षेप में कह सकते हैं कि नित्य वस्तु
सत्य है और अनित्य वस्तु मिथ्या ।
पीछे कह चुके
हैं, ‘नित्यवस्त्वेकं
ब्रह्म तद् व्यतिरिक्तं सर्वमनित्यम्’-नित्य
वस्तु एक ब्रह्म है और उसके अतिरिक्त सब कुछ अनित्य है। यहाँ ब्रह्म के स्थान
में आत्मा कह कर उसे सत्य अर्थात् नित्य कहते हैं और उसके अतिरिक्त सब कुछ
मिथ्या अर्थात् अनित्य बताते हैं। आत्मा और ब्रह्म एक है- यह हम आगे देखेंगे।
अभी हमें नित्य ब्रह्म का विवेक करने के लिए सत्स्वरूप आत्मा का विवेक करना
चाहिए। अज्ञान के कारण हम शरीर आदि को ही आत्मा समझ रहे हैं। इस अज्ञान को दूर
कर आत्मविवेक करना ही तत्त्वविवेक है।
आत्मा क:
?
स्थूल सूक्ष्म
कारण शरीराद् व्यतिरिक्त:
पञ्चकोशातीत:
सन्
अवस्थात्रय
साक्षी
सच्चिदानन्दस्वरूप:
सन्
य:
तिष्ठति स आत्मा ।
आत्मा क्या है?
स्थूल,
सूक्ष्म और कारण शरीरों से पृथक और पंचकोशों के परे जो तीनों अवस्थाओं का
साक्षी सत् और आनन्द स्वरूप होकर स्थित है वह आत्मा है।
व्याख्या -
आत्मा अपना स्वरूप है। अपना स्वरूप अपने से पृथक नहीं हो सकता। यह सत्,
चित् और आनन्द स्वरूप है। शरीर आदि हम से पृथक अनात्मा हैं, फिर भी भ्रम से उनमें आत्मभाव का अनुभव होता है। जब तक हम विचार न करेंगे, इसी भ्रम में पडे रहेंगे। यही भ्रम हमारे लिए कर्म बंधन का कारण बना हुआ है।
विवेक विचार से आत्मा को अनात्मा से पृथक कर भ्रम दूर किया जा सकता है। इसके
लिए आत्मा के लक्षण और अनात्मा के लक्षण पृथक
रूप से स्पष्ट ज्ञात होने चाहिए। उन्हीं लक्षणों की सहायता से आत्मा-अनात्मा का
भेद कर उन्हें पहचाना जा सकेगा। इसलिए लक्षणों सहित उनकी पहचान आगे बताई
जायेगी।
सामान्य रूप से
आत्म-विवेक के लिए तीन प्रक्रियायें अपनाई जाती हैं। सर्वप्रथम,
स्थूल, सूक्ष्म
और कारण शरीरों को अनात्मा समझकर उनके अतिरिक्त जो अपनी सत्ता उपलब्ध होती है, वहीं आत्मा जाना जाता है। उसमें सत्, चित् और आनन्द लक्षण मिलते हैं। दूसरी प्रक्रिया में, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय विज्ञानमय और आनन्दमय पांच कोशों के परे जाकर हम अपने स्वरूप को साक्षात्
पा सकते हैं। यहां भी आत्मा के तीनों लक्षण अनुभव में आते हैं। तीसरी प्रक्रिया
में,
जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की तीन अवस्थाओं पर विचार किया जाता है। इन अवस्थाओं का
साक्षी अपना स्वरूप आत्मा ही है। आत्मज्ञान कराने के लिए उपनिषदों में यही तीन
प्रक्रियायें अपनाई गयी हैं।
शरीरत्रय
आत्मा तीनों
शरीर से भिन्न है। इसलिए आत्मा को पहचानने के लिए तीन शरीरों के गुण-लक्षण जान
कर उन्हें अपने से पृथक करना होगा। तीनों शरीर हैं स्थूल,
सूक्ष्म और कारण। पहले स्थूल शरीर की पहचान बताते हैं। यह पहचान अपने शरीर में
देखनी चाहिए।
कारण शरीर
सूक्ष्म शरीर
स्थूल शरीर
स्थूलशरीरं
किम्
?
पञ्चीकृतपञ्च
महाभूतै: कृतं सत्कर्मजन्यं
सुखदु:खादिभोगायतनं शरीरं,
अस्ति जायते
वर्धते विपरिणमते अपक्षीयते विनश्यतीति
षड्
विकारवदेतत्स्थूल शरीरं ।
स्थूल शरीर
क्या है
?
पंचीकृत
पंचमहाभूतों से निर्मित सत्कर्मों से उत्पन्न सुख दुःख आदि भोगों के भोगने का
स्थान और अस्ति,
जन्म,
वृद्धि, परिवर्तन, क्षय तथा
विनाश इन छः विकारों से युक्त स्थूल शरीर है।
व्याख्या - हम
अपने जिस शरीर को देखते हैं,
वह स्थूल शरीर कहलाता है। यह पृथ्वी, जल,
अग्नि वायु तथा
आकाश नामक पंचमहाभूतों से मिलकर बना है। ये पांच तत्त्व दो कोटि के होते हैं-
अपंचीकृत और पंचीकृत। इनका वर्णन आगे किया जायेगा। यहाँ इतना समझ लेना पर्याप्त
है कि स्थूल शरीर पंचीकृत पंचमहाभूतों से निर्मित है। यह शरीर जितना स्थान
घेरता है वह आकाश है। स्वांस लेने पर वायु शरीर में जाती है। वह रक्त में मिल
जाती है। शरीर का ताप अग्नि तत्व के कारण है। पिये हुए जल से रक्त आदि में
तरलता है। अन्न के रूप में पृथ्वीतत्व शरीर में पहुँचता है, जिससे अस्थि, मांस आदि
बनें हैं। स्थूल शरीर पशु पक्षियों को भी प्राप्त है, किन्तु मनुष्य शरीर पुण्य कर्मों के फल से मिलता है। मुक्ति प्राप्त करने के
लिए यह एक सुन्दर अवसर है। यह शरीर भोगायतन भी है। इसमें रहकर जीव अपने कर्मों
का फल सुख-दुःख भोगता है। यह शरीर नश्वर है, क्योंकि इसमें छः विकार देखे जाते है- अस्तित्व, जन्म,
बढना, परिवर्तन, क्षय और
विनाश। इस प्रकार नश्वर होने के कारण शरीर अनित्य है और अनित्य होने के कारण
मिथ्या हैं। इस शरीर में आत्मा के एक भी लक्षण नहीं हैं। नश्वर होने के कारण
सत् नहीं है, जड भूतों
से निर्मित और कर्मफल का परिणाम होने से चित् नहीं है और विकारी होने के कारण
आनन्दरहित है।
सूक्ष्मशरीरं किम्
?
अपंचीकृत
पंचमहाभूतै:
कृतं सत्कर्मजन्यं
सुखदु:खादि
भोगसाधनं,
पंचज्ञानेन्द्रियाणि,
पंचकर्मेन्द्रियाणि, पंचप्राणादय:
मनश्चैकं
बुद्धिश्चैका एवं सप्तदशकलाभि:
सह
यत्तिष्ठति
तत्सूक्ष्मशरीरम् ।
सूक्ष्म शरीर
क्या है ?
अपंचीकृत
पंचमहाभूतों से निर्मित सत्कर्म के फल से उत्पन्न और सुखदुःख के भोगों का साधन
सूक्ष्म शरीर है। इसमें पांच ज्ञानेन्द्रियाँ,
पांच कर्मेन्द्रिरयाँ, पांच प्राण और मन-बुद्धि ये सत्रह कलायें, या अंग हैं।
व्याख्या -
स्थूल शरीर में सूक्ष्म शरीर का वास है। यह अपंचीकृत पंचमहाभूतों से निर्मित
होने के कारण सूक्ष्म है और भौतिक होने के कारण जड़ है। इसमें भासित होने वाली
चेतना इसकी अपनी नहीं है। इसकी रचना पूर्व जन्म में किये सत्कर्म के कारण होती
है। सत्कर्मों का फल भोग करने के लिए यह साधन है। पुण्य के साथ पाप कर्म भी
होते हैं। इसलिए इस शरीर के द्वारा सुख-दु:ख
दोनों का भोग करना पडता है। ध्यान रहे,
स्थूल शरीर भोग आयतन (भवन या कक्ष) है और सूक्ष्म शरीर भोग साधन (उपकरण) है।
सूक्ष्म शरीर में इन्द्रियाँ, प्राण और मन-बुद्धि आते हैं। इनको स्थूल शरीर से पृथक समझना चाहिए। स्थूल शरीर में
इनके गोलक या ठिकाने हैं जहाँ स्थित रहकर ये शरीर को चलाते हैं। इन्द्रियों आदि
का वर्णन आगे करते हैं।
श्रोत्रं त्वक
चक्षुः रसनाघ्राणम् इति पंच ज्ञानेन्द्रियाणि ।
कान,
त्वचा, नेत्र,
जिदृवा और नासिका-ये पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं।
व्याख्या - कर्ण
आदि पाँच इन्द्रियों से बाह्य जगत् का ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिए इन्हें
ज्ञानेन्द्रियाँ कहते हैं। ये सूक्ष्म रूप हैं। स्थूल शरीर के गोलकों में इनका
वास रहता है। इन सब इन्द्रियों का एक-एक देवता है। श्रोत्रस्य दिग्देवता,
त्वचो वायुः,
चक्षुषः सूर्यः,
रसनाया वरुणा,
घ्राणस्य अश्विनौ, इति
ज्ञानेय देवताः । कान का देवता दिक,
त्वचा का वायु,
चक्षु का सूर्य,
जिदृवा का वरुण और नासिका के अश्विनीकुमार हैं। ये ज्ञानेन्द्रियों के देवता
हैं।
व्याख्या - देवता द्योतन करने वाली शक्तियाँ हैं। ईश्वर समस्त
जगत् का नियंता है। उसके अंशभूत देवता उसके अधीन रहकर जगत् और जीवों पर
प्राकृतिक नियमों के अनुसार नियंत्रण रखते हैं। ये देवता हमारे अन्दर व्यष्टि
रूप से और बाहर जगत् में समाष्टि रूप में प्रकृति के किसी विशेष नियम का संचालन
करते हैं। वह देवता वहाँ का अधिष्ठाता होता है।
उदाहरण के रूप में,
(१)
स्थूल शरीर का कान और उसका छिद्र आदि जड गोलक है,
(2) उसमें स्थित क्रियाशक्ति प्राण है। जिसके द्वारा शब्द तरंगे कान
के पर्दे से मस्तिष्क तक पहुँचती हैं। और (३) उसके साथ विद्यमान रहने वाला चेतन
तत्त्व ही प्राण,
शब्द और शरीर (कान) की उपाधि से देवता है। इन सबके सहयोग से हम शब्द ग्रहण करते
है। कान का देवता दिक या आकाश है। बाहर समस्त आकाश में व्याप्त चैतन्य आकाश की
उपाधि धारण कर दिक देवता है। उसी का एक अंश कान में स्थित होकर हमें शब्द सुनने
में सहायता करता है। यही नियम अन्य इन्द्रियों के साथ है।
ईश्वर और उसके अधीनस्थ इन देवताओं का विस्तृत वर्णन हम ईश्वर के
प्रसंग में आगे करेंगे।
श्रोत्रस्य विषय:
शब्दग्रहणं ।
त्वचो विषय:
स्पर्शग्रहणं ।
चक्षुषो विषय:
रूप ग्रहणम् ।
रसनाया विषय:
रसग्रहणम् ।
घ्राणस्य विषय:
गंधग्रहणम् इति ।
कान का विषय शब्द
ग्रहण, त्वचा का
विषय स्पर्शग्रहण,
चक्षु का विषय रूपग्रहण,
जिदृवा का विषय रसग्रहण और नाक का विषय गन्धग्रहण करना है।
व्याख्या - सभी
ज्ञानेन्द्रियों
के कार्यक्षेत्र बटे हुए हैं। वे अपने ही क्षेत्र में कार्य करती हैं। इसलिए
पांच
ज्ञानेन्द्रियों
के लिए विषयों के क्षेत्र भी पांच हैं। पांच विषय हैं। शब्द स्पर्श, रूप, रस
और गन्ध। इन्द्रियां
इन विषयों को मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं और वहाँ से वे मन और बुद्धि को पहुँचाते
हैं।
वाक्पाणिपादपायूपस्थानि इति पंचकर्मेन्द्रियाणि ।
वाक हाथ,
पैर,
गुदा
और उपस्थ पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं।
व्याख्या - कर्म
करने के लिए पांच इन्द्रियाँ हैं। इनसे पांच प्रकार के कर्म किये जाते हैं। जिस
हाथ से हम लेने,
देने या लिखने का काम करते हैं, यह
स्थूल शरीर का एक भाग है। इसी में हस्तेन्द्रियाँ वास करती है। उसके काम करने
पर स्थूल शरीर का यह अंग काम करता दिखाई देता है। हस्तेन्द्रियाँ सूक्ष्म शरीर
का अंग है। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों को भी समझना चाहिए। ज्ञानेन्द्रियों की
भाँति इन कर्मेन्द्रियों के भी अपने-अपने देवता होते हैं।
वाचो देवता वदृन:
। हस्तयोरिन्द्र:
। पादयोर्विष्णु:
।
पायोर्मृत्यु:
। उपस्थस्य प्रजापति:
।
इति कर्मेन्द्रिय
देवता:।
वाणी का देवता
अग्नि, हाथ का
इन्द्र, पैर
का विष्णु,
गुदा का मृत्यु और उपस्थ इन्द्रिय का देवता प्रजापति है। ये कर्मेन्द्रियों के
देवता हैं।
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