पुनर्जन्म के सिद्धान्त
हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म के सिद्धान्त बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस जन्म से पूर्व हम अगणित शरीर धारण कर जन्म-मृत्यु भोग चुके हैं । "संसार" शब्द गहन अर्थ रखता है । "संसार" शब्द से सभी लोग परिचित हैं, किन्तु बहुत लोगों को उसके वास्तविक अर्थ का ज्ञान नहीं है । सामान्य रुप से हम उसका अर्थ लोक या लौकिक जीवन समझते हैं । हिन्दू शास्त्रों के अनुसार हम इस लोक में बार -बार आते हैं और फिर अन्य सूक्ष्म तथा उच्च लोकों में चले जाते हैं । इस प्रकार हमारा बार-बार जन्म और बार-बार मृत्यु होती है । भगवान श्री शंकराचार्य जी ने अपनी कृति "भज गोविन्दम् " में इस शलोक के माध्यम से इस सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं ।
" पुनरपि जननं पुनरपि मरणं "
अर्थात बार-बार जन्म लेना बार-बार मरना । जन्म-मृत्यु के इसी चक्र में धूमते रहने को हम संसार कहते है। समस्त हिन्दू जाति संसार सम्बन्धी इस विचार को मानती है। अन्य संप्रदायों में भी इस पुनर्जन्म के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है। इसीलिए वे किसी न किसी प्रकार अपने पूर्वजों की पूजा करते है।
दर्शन व्यवाहार में आने पर धर्म कहलाता है। अव्यावाहारिक दर्शन हवाई महल है। उसका कोई उपयोग नही है। उसे उपयोग में कैसे लाया जाय, यह देखने के लिए पहले मनुष्य की संरचना समझ लेनी चाहिए।
अधीक जानने के लिए पुर्नजन्म विषय पर स्लाईडकास्ट देखे।