आत्मा सत्य है और उसके अतिरिक्त सब कुछ मिथ्या है।

 

तत्त्व-ज्ञान वेदान्त दर्शन का ज्ञान कराने वाली प्रथम पुस्तक है। दुःख भोगने वाला मनुष्य यह मान कर र्धेय धारण कर लेता है कि कुछ न कुछ दुःख सबको सहन करना पड़ता है, इससे पूर्णतः बचा नहीं जा सकता। किन्तु वस्तुतः ऐसा नहीं है। मनुष्य को दुःख से बचाने के लिए ही अध्यात्म-विद्या का विकास हुआ है। यह विद्या उपनिष्द, गीता आदि शास्त्रों में भली-भांति दी गयी है। उन्हें समझने के लिए कुछ सहायक ग्रन्थों की भी रचना की गयी है। इन्हें प्रकरण ग्रन्थ कहते है। भगवान शंकराचार्य द्वारा लिखा गया तत्त्वबोध नामक छोटा सा ग्रन्थ भी प्रकरण ग्रन्थ है।

 

"तत्त्वबोध" में तीन शरीर, तीन अवस्थायें और पाँच कोशों का वर्णन कर आत्मतत्त्व को खोजने का उपाय बताया गया है। जगत की सूक्ष्म और स्थूल रचना का निरुपन कर उसमें जीवकी स्थिति स्पष्ट की गयी है। जीव और ईश्वर का सम्बन्ध हुए उसके तात्त्विक रुप की एकता भी दिखाई गयी है। इसके साथ ही कर्म बंधन का रहस्य बताकर उनसे छूटने और जीवनमुक्त होने का विधान भी स्पष्ट कर दिया गया है। जीवनमुक्त होना ही मनुष्य की अन्तिम और सर्वोपरि कामना है।

तत्त्वबोध होने से मनुष्य मुक्त हो जाता है । तत्त्वविवेक का उदय उन्हीं पुरुषों के ह्रदय में होता है जो चार महत्त्वपूर्ण गुणों से सम्पन्न हैं। चार महत्त्वपूर्ण गुण इस प्रकार हैः

 

1) नित्य और अनित्य वस्तु का विवेक

2) इस लोक और परलोक में अपने कर्मों के फलभोग से वैराग्य

3) सम, दम , उपरति , तितिक्षा,  श्रद्धा और समाधान गुणों का होना।

4) मोक्ष प्राप्त करने की प्रबल इच्छा

आत्मा सत्य है और उसके अतिरिक्त सब कुछ मिथ्या है। यही तत्त्वविवेक है। अज्ञान के कारण हम शरीर आदि को ही आत्मा समझ रहे हैं। तत्वज्ञान इस अज्ञान को दूर करता है। 

 

चिन्मय मिशन

चिन्मय मिशन एक आध्यात्मिक संस्था है जो गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द जी  द्वारा स्थापीत की गई. शेष ...

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