मुख्यपृष्ठ

संपादकीय

विचार

 

    विचार एक शक्ति है और यदि इसको सुव्यवस्थित कर लिया जाये, तो यह शक्ति अज्ञेय हो जाती है। मन में विचारों का निरन्तर विस्फुरण होता रहता है और ये आस - पास के संसार की ओर दौड़ते रहते हैं। यह व्यक्तित्व की ऊर्जा का दुखद अपव्यय है। जागरुक प्रयत्नों द्वारा हम मन को इस तरह प्रशिक्षित कर सकते हैं कि वह वांछित क्षेत्रों में उपलब्धियों और सफलता की प्राप्ति हेतु अदमनीय शक्ति का रुप ले ले।  

 

वैज्ञानिक, विचारक, दार्शनिक, कवि, संगीतज्ञ, चित्रकार - जिन्होंने  भी संसार में महान सफलता की प्राप्ति की है वे सभी के सभी उद्घोषणा करते है कि एक प्रशिक्षित और अनुशासित मानव-मन दिव्य सामर्थ्य से युक्त होकर महान् सफलता का कारण हो जाता है।

 

जैसा इस जीवन में है वैसा ही मृत्यु के समय और उसके बाद भी होता है। जब आप क्लब के बारे में सोचते हैं और घर से बाहर निकलते हैं,  आप क्लब की ओर जाते हैं, न कि मार्केट, थियेटर अथवा आफिस की ओर। हमारी शक्तिशाली भावनायें ही हमारे कर्मों में अभिव्यक्त होती हैं। हमारी बाह्य क्रियायें हमारे गहन विचारों और भावनाओं की स्पष्ट सूचक होती हैं।

 

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं।

 

" मनुष्य मृत्यु के समय जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, हे कुन्तीपुत्र, वह सदा उसी भाव में रंगा रहने के कारण उसे ही प्राप्त होता है "

 

 

मृत्यु के समय मन - बुद्धि जिसे सूक्ष्म शरीर कहा जाता है, अपने " स्थूल शरीर "  रुपी भौतिक ढाँचे का त्याग कर देता है। स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर के बाहर निकलने की तुलना बन्दूक से छूटने वाली गोली से की जा सकती है। गोली चलाने के समय बन्दूक की नली का रुख गोली की दिशा का निश्चय करता है। इसी तरह,  सूक्ष्म शरीर की उड़ान का दिशा - निर्देशन मृत्यु के समय वासना रुपी बन्दूक की नली की दिशा द्वारा होता है। साधक जीवन भर जिन विचारों का चिन्तन करता रहा था, वही स्थूल शरीर की मृत्यु के पश्चात सूक्ष्म शरीर की उड़ान की अन्तिम दिशा का निश्चय करते हैं।